मध्य प्रदेश के 1.5 लाख शिक्षकों की बढ़ी मुश्किलें, TET अनिवार्यता के खिलाफ लामबंद हुए शिक्षक!

पूनम अग्रवाल सिटी बीट न्यूज बरेली

मध्य प्रदेश के शिक्षा विभाग में इन दिनों खलबली मची हुई है। लोक शिक्षण संचालनालय और जनजातीय कार्य विभाग द्वारा जारी एक नए आदेश ने प्रदेश के करीब डेढ़ लाख शिक्षकों की रातों की नींद उड़ा दी है। मामला है—सेवा में रहते हुए शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी TET पास करने की अनिवार्यता,,, इसी कड़ी में बरेली तहसील के शिक्षकों ने मुख्यमंत्री के नाम एक ज्ञापन सौंपकर इस आदेश को रद्द करने की मांग की है।

दरअसल, आयुक्त लोक शिक्षण और जनजातीय कार्य विभाग ने मार्च 2026 में आदेश जारी कर सभी ‘नॉन-टेट’ शिक्षकों को पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करने के निर्देश दिए हैं। लेकिन शिक्षकों का कहना है कि यह आदेश न केवल व्यवहारिक रूप से गलत है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और NCTE के नियमों का भी उल्लंघन है।

शिक्षकों ने अपने ज्ञापन में तीन मुख्य तर्क रखे हैं:

NCTE नियम 2010: राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद के नियमों के अनुसार, 3 सितंबर 2001 से पहले और उसके बाद नियुक्त संविदा शाला शिक्षकों को कुछ विशेष प्रावधानों के तहत छूट दी गई है।

गुरुजी से संविदा शिक्षक: वर्ष 2011 से 2014 के बीच जो ‘गुरुजी’ संविदा शिक्षक बने, उन्हें भी नियमों के तहत इस परीक्षा से मुक्त रखा गया है।

सुप्रीम कोर्ट का हवाला: माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूर्व में दिए गए निर्णयों में भी वरिष्ठता और सेवा अवधि के आधार पर इस तरह की छूट का उल्लेख है।

“हम पिछले 20-25 सालों से अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। इस उम्र में और इतने अनुभव के बाद अब पात्रता परीक्षा का दबाव बनाना हमारे मानसिक और आर्थिक हितों के खिलाफ है। शासन को हमारी सेवा अवधि की गणना नियुक्ति दिनांक से करनी चाहिए, न कि हमें नई परीक्षाओं में उलझाना चाहिए।”बरेली में अनुविभागीय अधिकारी (SDM) को सौंपे गए इस ज्ञापन में शिक्षकों ने चेतावनी दी है कि यदि 2 मार्च और 26 मार्च 2026 को जारी इन आदेशों को वापस नहीं लिया गया, तो प्रदेश भर के डेढ़ लाख शिक्षक बड़े आंदोलन के लिए मजबूर होंगे। शिक्षकों का तर्क है कि वे लंबे समय से ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में शिक्षा की अलख जगा रहे हैं, ऐसे में उन पर इस तरह का ‘पेहमती’ (दबावपूर्ण) निर्णय थोपना अनुचित है।

अब गेंद मुख्यमंत्री के पाले में है। क्या सरकार इन डेढ़ लाख परिवारों की गुहार सुनेगी या फिर नियमों की पेचीदगियों में शिक्षक उलझे रहेंगे? यह देखना दिलचस्प होगा।

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