“बरेली को जिला बनाना सिर्फ़ प्रशासनिक कदम नहीं, इतिहास को भविष्य से जोड़ने का अवसर है”

भूपेन्द्र राजपूत सिटी बीट न्यूज।

मध्य प्रदेश में प्रशासनिक पुनर्गठन की प्रक्रिया तेज़ है। ऐसे में रायसेन जिले की बरेली तहसील को नया जिला बनाने की दो दशक पुरानी माँग अब ‘सिर्फ आकांक्षा नहीं, बल्कि प्रशासनिक और विकासात्मक अनिवार्यता’ बन चुकी है। यह माँग किसी एक विधायक या क्षेत्रीय समूह की नहीं, बल्कि “सुशासन, भौगोलिक न्याय और ऐतिहासिक पहचान के पुनर्संरक्षण” की माँग है।

– इतिहास को आधुनिक प्रशासन से जोड़ने का अवसर

बरेली को जिला बनाना सिर्फ़ प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि ‘इतिहास को भविष्य से जोड़ने का अवसर’ है।
यह कदम नवाबों के दौर की पुरानी व्यवस्थाओं को बदलकर ‘लोकतंत्र, दक्षता और सुशासन की नई परिभाषा’ गढ़ सकता है।

– बोरास के वीरों का अमर बलिदान

14 जनवरी 1949 को नर्मदा तट स्थित बोरास (उदयपुरा विधानसभा) में भोपाल रियासत के विलीनीकरण आंदोलन के समर्थन में विशाल सभा आयोजित थी। आंदोलनकारियों ने तिरंगा फहराने का संकल्प लिया, लेकिन नवाब की पुलिस ने इसकी अनुमति नहीं दी। कठोर पहरे के बावजूद जब तिरंगा लहराया गया तो रियासत के थानेदार जाफर ने निहत्थे देशभक्तों पर गोलियां चलवा दीं। गोली लगने के बावजूद वीर आंदोलनकारी तिरंगा झंडा जमीन पर नहीं गिरने दिया और अपने प्राणों की आहुति दे दी।

भोपाल रियासत के भारत में विलीनीकरण हेतु अपने प्राण न्योछावर करने वाले ‘अमर शहीद धनसिंह जी, मंगलसिंह जी, विशालसिंह जी और छोटेलाल जी’ के बलिदान को आज भी बोरास का शहीद स्मारक सजीव करता है। उनका साहस और देशप्रेम आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का दीप है।

-विलंब क्यों, जब उदाहरण स्पष्ट हैं?

राज्य सरकार ने हाल ही में ‘पांढुर्णा’ और ‘मैहर’ को नया जिला घोषित किया है — जिससे यह सिद्ध होता है कि सरकार की प्राथमिकता नागरिकों के निकट प्रशासन पहुँचाने की है।
ऐसे में, जब रायसेन मुख्यालय से बरेली और उदयपुरा जैसे क्षेत्र ‘180 किलोमीटर तक दूर’ हैं, तो यह दूरी न सिर्फ़ विकास की रफ़्तार रोकती है बल्कि शासन-प्रशासन के प्रभाव को भी सीमित करती है।

जब ‘मंडला से डिंडोरी’ और ‘छिंदवाड़ा से पांढुर्णा’ को अलग कर प्रशासनिक सुगमता दी जा सकती है,
तो ‘रायसेन से बरेली’ को विलग करने में हिचकिचाहट क्यों?
न्यायिक व्यवस्था पहले ही संकेत दे चुकी है — ‘एडीजे कोर्ट’ की स्थापना बरेली में हो चुकी है।
अब आवश्यकता है कि प्रशासनिक आयोग भी इस भू-भाग की वास्तविकताओं को स्वीकारे और बरेली को एक ‘सुगम, चुस्त और जवाबदेह प्रशासनिक केंद्र’ के रूप में विकसित करे।

– पर्यटन: विंध्यांचल की गोद में छिपा खजाना

 

प्रस्तावित बरेली जिला सिर्फ़ प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि ‘इतिहास, अध्यात्म और रोमांच का संगम’ है।

विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की तलहटी में बसा यह क्षेत्र ‘सिंघोरी अभ्यारण्य’, ‘जामवंत गुफाएँ’, ‘मृगन्नाथ की रहस्यमयी गुफा’ और ‘ देवरी-उदयगिरी की प्राचीन दीवार’, मध्यप्रदेश के धार्मिक महत्व और श्रद्धा का केंद्र ‘छींद वाले दादाजी का दरबार’ जैसी धरोहरों का धनी है। इसके साथ नर्मदा की अविरल धारा के दोनों ओर सैकड़ों ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व से परिपूर्ण स्थलों का परिदृश्य है।

यह क्षेत्र यदि नया जिला बनता है, तो इन धरोहरों का संरक्षण, पर्यटन संरचना का विस्तार और स्थानीय अर्थव्यवस्था का सशक्तीकरण संभव होगा।

‘पर्यटन को उद्योग का रूप देकर’ यह क्षेत्र न केवल मध्य प्रदेश के पर्यटन मानचित्र पर उभरेगा, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का केंद्र भी बनेगा।

– कृषि और गौ-सेवा: विकास की दो आधारशिलाएँ

यह भू-भाग धान, गेहूँ और दलहन उत्पादन का ‘महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्र’ है। यदि इसे स्वतंत्र जिला बनाया जाए, तो ‘बारना बाँध’ का जल प्रबंधन अधिक सक्षम होगा, और कृषि आधारित उद्योगों को स्थानीय स्तर पर प्रोत्साहन मिल सकेगा।

इसके साथ ही, यहाँ ‘गौ-संरक्षण और संवर्धन’ के लिए विशेष अभ्यारण्य स्थापित करने की भी प्रबल संभावना है; जो ‘स्थानीय आस्था’ को बल देगा और ‘राज्य की नीति प्राथमिकताओं’ के अनुरूप होगा।

– बरेली को मिले विकास की धुरी बनने का अवसर

जब राज्य नए जिलों के गठन की दिशा में अग्रसर है, तब ‘इतिहास, कृषि और पर्यटन’ तीनों की प्रबल क्षमता वाला यह क्षेत्र प्राथमिकता का हक़दार है। जनता की यह माँग अब सिर्फ़ एक आवाज़ नहीं, बल्कि ‘विकास की दिशा में उठी हुई परिपक्व पुकार’ है। जिसे अनसुना करना भविष्य की प्रशासनिक दृष्टि से भी अन्याय होगा। प्रशासनिक सुगमता, पर्यटन और कृषि;
तीनों के संगम का केंद्र ‘बरेली’ को रायसेन से विलग होकर इतिहास की धुरी बनने का समय अब आ गया है।

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