
JAIPUR. क्या राजस्थान की सियासत में भाजपा के उभरते युवा चेहरे और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को मरुभूमि के ‘स्थापित चेहरे’ पचा नहीं पा रहे हैं। यह सवाल इसलिए सामयिक है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद जिस तरह से भजनलाल शर्मा को सियासी स्तर पर परेशान होना पड़ रहा है।
उससे ऐसा लगता है कि उनकी आगे की राह बहुत आसान नहीं रहने वाली है। सीएम भजनलाल शर्मा को लेकर सोशल मीडिया पर उभरती सुगबुगाहट और अंदरूनी खेमेबाजी इस ओर इशारा करती है कि भाजपा के पुराने चेहरे उन्हें पूरी तरह से पचा नहीं पा रहे हैं।
सीएम बनने के बाद से सहज नहीं क्षत्रप
वर्ष 2023 में भाजपा की सरकार बनने के बाद जब पार्टी के विधायक दल की बैठक में भजनलाल शर्मा को सीएम चुना गया, तभी से यहां भाजपा के क्षत्रप पशोपेश में हैं। उसके बाद जब मंत्रिमंडल की सूची आई, तब भी कई मंत्री अपने विभागों को लेकर सहज नहीं दिखे थे।
हालांकि, लोकसभा चुनाव तक यह सियासी लकीर लंबी खिंचती नजर आई। फिर सात विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में परीक्षा की घड़ी आई, किन्तु इसमें भजनलाल शर्मा पास हो गए थे।
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स्थापित बनाम नई सियासी पौध
राजस्थान में वर्ष 2023 के चुनाव में भाजपा के राजेंद्र राठौड़ और सतीश पूनियां जैसे दिग्गज नेता चुनाव हार गए। उसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, किरोड़ी लाल मीणा, जोगेश्वर गर्ग, श्रीचंद कृपालानी, कालीचरण सराफ जैसे नेता सीएम की रेस में आना चाहते थे। मगर, ऐसा नहीं हुआ।
भाजपा के दिल्ली नेतृत्व ने स्थापित चेहरां की बजाय पहली बार के जीते युवा चेहरे भजनलाल शर्मा पर भरोसा जताया। लेकिन, भाजपा सरकार के डेढ़ साल गुजरने के बाद राजस्थान में एक बार फिर से वहीं सियासी माहौल गर्म है।
सचिन भी लग गए थे किनारा
राजस्थान की सियासत में यह कोई नया खेल नहीं है। कुछ ऐसा ही पिछली अशोक गहलोत सरकार में भी हुआ था। तब प्रदेश की जनता में लोकप्रिय नेता और पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट को किनारे लगना पड़ा।
उन्हें इस्तीफा देकर कांग्रेस में साइडलाइन होना पड़ा। यहां के पुराने नेता केंद्र की राजनीति में रहने के लिए ज्यादा इच्छुक नहीं रहते। इसका नतीजा यहां की साफ सियासत पर दिखता है।
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गहलोत के बहाने बड़े संकेत
पिछले दिनों मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को लेकर पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने कई संकेत दिए थे। उन्होंने भजनलाल शर्मा को युवा और नया बताया। लेकिन यह भी कहा कि भजनलाल को हटाए जाने के पीछे दिल्ली और जयपुर में षडंयत्र रचा जा रहा है।
इस बयान के बाद से यहां पर सियासत तेज हो गई। एक राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि गहलोत ने तो सिर्फ एक सियासी कंकड़ हवा में उछाला था। लेकिन अब उसे आधार मान कर भाजपा के स्थापित चेहरों की तरफ से दिल्ली तक मजबूती से बात पहुंचाने की कोशिश हो रही है।
सोशल मीडिया पर ‘भजनलाल ट्रेंड’ इत्तेफाक नहीं
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पिछले कुछ दिनों से भजनलाल विभिन्न हैशटैग से ट्रेंड कर रहे हैं। ट्विटर, इंस्टाग्राम और फेसबुक पर मुख्यमंत्री की हर छोटी-बड़ी गलती को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। शुक्रवार को ‘भजनलालहटाओ-राजस्थान बचाओ’ हैशटैग ट्रेंड करता रहा। हालांकि बाद में ‘राजस्थानविदभजनलाल’ ट्रेड हो गया।
मज़े की बात ये है कि ये हमले सीधे विरोधियों से नहीं, बल्कि पार्टी के ही ‘अंदरूनी स्तर’ से भी हो रहे हैं। ये ठीक वैसा ही माहौल है, जैसा कांग्रेस में सचिन पायलट के समय देखा गया था-जहां युवा चेहरों को आगे बढ़ने से पहले ही ‘काट’ दिया जाता था।
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भविष्य में क्या होगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर भाजपा हाईकमान ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया तो राजस्थान की सत्ता में फिर वही अंतर्कलह पनप सकती है, जो कांग्रेस को ले डूबी। भजनलाल शर्मा की पकड़ जनता में मजबूत होती जा रही है, लेकिन पार्टी के कुछ ‘पुराने खिलाड़ियों’ को यही बात चुभ रही है। सवाल यही उठता है- क्या भाजपा कांग्रेस की गलतियों से सबक ले पाएगी या वही राह दोहराई जाएगी?
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