कहते हैं जामवंत जी ने की थी तिल गणेश जी की स्थापना हर साल तिल बराबर बढ़ती है श्री गणेश प्रतिमा

विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं में द्वापर युगीन तिल गणेश मंदिर

सिटी बीट न्यूज़ की खास रिपोर्ट |
प्रदीप धाकड़ / कमल याज्ञवल्क्य
बरेली (रायसेन) ।

तहसील मुख्यालय बरेली से लगभग 15 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत उदयगिरि के जंगलों के बीच, विंध्याचल पर्वत पर लगभग 1500 फीट ऊंचाई पर स्थित है प्राचीन तिल गणेश धाम।धार्मिक मान्यताओं और लोककथाओं के अनुसार इस दुर्लभ गणेश प्रतिमा की स्थापना द्वापर युग में स्वयं जामवंत जी द्वारा की गई थी।

छह भुजाओं वाली अद्भुत प्रतिमा

श्री गणेश प्रतिमा को “तिल गणेश” तथा जामवंत गणेश इसलिए कहा जाता है क्योंकि बुजुर्ग बताते हैं कि प्रतिमा की ऊंचाई हर वर्ष एक तिल के बराबर बढ़ती रही है। प्रारंभ में यह प्रतिमा लगभग छोटे आकार की थी , अब प्रतिमा का आकार काफी बढ़ गया है। इस प्रतिमा की खासियत इसकी छह भुजाएं हैं, जबकि आजकल प्रचलित गणेश प्रतिमाएं चार भुजाओं वाली होती हैं।पुराणों के अनुसार सतयुग की प्रतिमाएं आठ भुजाओं वाली, द्वापर युग की छह भुजाओं वाली और कलियुग की चार भुजाओं वाली मानी जाती हैं। इस दृष्टि से यह प्रतिमा द्वापर युगीन मानी जाती है।

मढिया से बाहर नहीं निकल सकी प्रतिमा

बुजुर्ग पंडित शिवनारायण शर्मा बताते हैं कि जब पचास साल पहले साईकल से यहाँ आते थे तो श्री तिल गणेश जी प्रतिमा छोटी थी, अब बड़ी हो गई है। प्रारंभ में यह प्रतिमा खुले चबूतरे पर स्थापित थी। वे बताते हैं कि हमने बुजुर्गों से भी सुना है कि श्री तिल गणेश जी प्रतिमा पहले छोटी थी, हमने भी देखा है अब श्री तिल गणेश जी प्रतिमा बड़ी हो गई है।यहाँ के बुजुर्ग पुजारी करन सिंह भगतजी बताते हैं कि करीब चालीस बर्षो से श्री तिल गणेश जी नित्य पूजा आरती कर रहें हैं। वे बताते हैं कि पहले गणेश जी की प्रतिमा इतनी छोटी थी कि एक व्यक्ति उठा सकता था, अब प्रतिमा इतनी बड़ी हो गई है कि दस व्यक्ति भी नहीं उठा सकते। जामवंत जी से यहाँ का संबंध है। जामगढ़ में जामवंत गुफा है, पत्थरों की चट्टानों पर पैरों के निशान हैं और यहाँ भी पैरों के निशान हैं। चमत्कार यहाँ भी होते रहते हैं। कई दशक पहले सच्चिदानंद गुरुजी (बापौली वाले बूढ़े गुरुजी) ने पर्वत पर एक छोटी मढिया बनाकर इसमें गणेश प्रतिमा की स्थापना की थी। बाद में जब मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ और प्रतिमा को मढिया से बाहर लाने का प्रयास किया गया, तो यह अपने बड़े आकार के कारण दरवाजे से नहीं निकल सकी। मजबूरन मढिया को तोड़ना पड़ा, जिसके बाद प्रतिमा बाहर लाई जा सकी।

जामवंत जी के पदचिह्न और गुफा

मंदिर से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर जामवंत जी की गुफा स्थित है। आसपास की चट्टानों और पत्थरों पर आज भी उनके पदचिह्न स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। मंदिर के आसपास के पर्वतों पर विशाल पत्थरों से बनी दीवारें भी देखने को मिलती हैं, जो इस क्षेत्र की प्राचीनता और ऐतिहासिक महत्ता को दर्शाती हैं।

कठिन है मंदिर तक पहुंच

ग्राम उदयगिरि के समाजसेवी दीपेन्द्र राजपूत बताते हैं कि उदयगिरि से आगे मार्ग बेहद दुर्गम है। घने जंगल, कीचड़ भरे कच्चे रास्ते, नाले-झरने और करीब 600 पथरीली सीढ़ियां चढ़कर ही श्रद्धालु मंदिर तक पहुंचते हैं। यहां न तो बिजली है और न ही पीने के पानी की व्यवस्था। श्रद्धालु और पुजारी स्वयं पानी, भोजन और पूजन सामग्री साथ लेकर आते हैं। हर माह की गणेश चतुर्थी और गणेश उत्सव के दौरान यदि मौसम अनुकूल हो तो सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर और मार्ग में बिजली न होने से श्रद्धालु परेशान रहते हैं। कई बार मांग रखने के बावजूद वन विभाग सड़क बनने की अनुमति नहीं दे रहा है।

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