भूपेन्द्र राजपूत
सिटी बीट न्यूज नेटवर्क भोपाल

रायसेन के गौहरगंज में मासूम बच्ची के साथ हुआ दुष्कर्म सिर्फ एक जघन्य आपराधिक घटना नहीं, बल्कि प्रदेश की ‘व्यवस्था, सुरक्षा तंत्र और न्याय प्रणाली—तीनों के लिए कठोरतम चेतावनी’ है। यह वह घटना है जिसने पूरे प्रदेश की आत्मा को भीतर तक झकझोर दिया है।
आरोपी सलमान का 21 नवंबर से फरार रहना, घने जंगलों को पार कर लगभग 50 किलोमीटर दूर राजधानी भोपाल तक पहुँचना, वहाँ किराए का कमरा खोजना और 27 नवंबर तक बेखौफ घूमते रहना…
यह सब इस भयावह सच्चाई की पुष्टि करता है कि ‘कानून का डर अपराधियों के मन से लगभग समाप्त हो चुका है।’
और जब अपराधी निर्भीक हो जाए, तब समाज का क्रोध उबलना स्वाभाविक है।
– अनसुलझे सवाल और तंत्र की विफलता:
यह पूरा घटनाक्रम कई गंभीर सवाल छोड़ जाता है…
* आरोपी छह दिनों तक पुलिस,लोकल इंटेलिजेंस और सुरक्षा एजेंसियों को चकमा देकर राजधानी तक कैसे पहुँचा?
* क्या वह अकेला यह फरारी काट पाया या किसी स्थानीय/बाहरी नेटवर्क ने उसे सहायता दी?
* राजधानी में खुलेआम घूमता आरोपी आखिर तक पकड़ में क्यों नहीं आया?
* क्या पुलिस की प्रतिक्रिया गति अपेक्षित स्तर की थी?
यह कड़वी सच्चाई है कि ‘गिरफ्तारी प्रशासन की नहीं, बल्कि आम नागरिकों की सतर्कता से संभव हुई।’ भागने की कोशिश में हुए ‘शॉर्ट एनकाउंटर’ ने भले कार्रवाई का संकेत दिया हो, पर सवाल अब भी कायम है…
‘क्या केवल एनकाउंटर व्यवस्था की विफलता छिपा सकता है?’
जनता जानना चाहती है कि अपराधी ही नहीं, ‘अपराध को संभव बनाने वाला पूरा तंत्र’ भी कब कठघरे में खड़ा होगा।
– जनमानस का आक्रोश और मृत्युदंड की पुकार:
प्रदेश की जनता का धैर्य अब टूट चुका है।
गुस्सा केवल अपराधी पर नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर है जिसने ऐसे हैवानों को निर्भीक होने का साहस दिया।
* जगह-जगह ‘प्रदर्शन’
* महिलाओं और युवाओं के ‘आंदोलन’
* प्रशासन को ‘ज्ञापन’
* और एक ही आवाज़—“फांसी चाहिए!”
जनता साफ कह रही है…
“हम केवल गिरफ्तारी नहीं, अपराध की जड़ पर प्रहार चाहते हैं। यदि इस बार भी व्यवस्था ढीली पड़ी, तो अपराधियों का मनोबल और बढ़ेगा।”
– न्यायपालिका की अग्निपरीक्षा – अब फैसला नज़ीर बनना चाहिए:
सरकार द्वारा इस मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में भेजा जाना स्वागतयोग्य है। पर जनता की अपेक्षाएँ अब और ऊँची हैं।
* न्याय तेज़ हो
* कठोर हो
* और ऐसा हो जिसे देखकर समाज में कानून का जीवंत भय पैदा हो
– कानूनी प्रक्रिया तुरंत और प्रभावी हो:
इस जघन्य अपराध में न्याय प्रक्रिया को अनावश्यक विलंब से मुक्त रखना आवश्यक है। इसके लिए:
* पुलिस वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर
* समयबद्ध चार्जशीट दाखिल करे
* फास्ट ट्रैक कोर्ट में ‘दैनिक आधार (Day-to-Day)’ पर सुनवाई हो
* पीड़िता की गवाही सुरक्षित वातावरण में रिकॉर्ड की जाए
* POCSO Act के तहत कठोरतम धाराएँ लागू हों
* यदि अपराध सिद्ध होता है, तो ‘आजीवन कारावास से लेकर मृत्युदंड’—दोनों विकल्पों पर गंभीरता से विचार हो
* अपील प्रक्रिया उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में भी ‘तेज़ी से आगे बढ़े’
यह आवश्यक है कि ‘न्याय प्रक्रिया उतनी ही कठोर हो जितना अपराध।’
✍️ भूपेन्द्र सिंह राजपूत










