हाईकोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय: दोष सिद्ध हुए बिना वाहन की जब्ती असंवैधानिक

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में एक साथ कई मामलों को लेकर याचिकाएं दायर की गई थीं, जिनमें प्रमुख रूप से यह सवाल उठाया गया था कि क्या राज्य सरकार दोष सिद्ध हुए बिना किसी व्यक्ति की संपत्ति, विशेषकर वाहन, को जब्त कर सकती है। वर्तमान में लागू मध्यप्रदेश आबकारी अधिनियम की धारा 47-A कलेक्टर को यह अधिकार देती है कि वे केवल आरोप के आधार पर वाहन या अन्य संपत्ति जब्त कर लें, भले ही संबंधित व्यक्ति को अदालत द्वारा दोषी घोषित न किया गया हो। यह स्थिति उन नागरिकों के लिए त्रासदी बन गई थी, जिनके खिलाफ केवल प्राथमिकी दर्ज हुई थी लेकिन सालों तक केस लंबित रहने के कारण उन्हें उनकी आजीविका के साधनों से भी वंचित रहना पड़ा।

नागरिकों के अधिकारों का हनन कर रही धारा 47 A 

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत के समक्ष यह महत्वपूर्ण दलील दी गई कि धारा 47-A संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 300-A (कानून द्वारा ही संपत्ति से वंचित किए जाने का प्रावधान) का स्पष्ट उल्लंघन करती है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को दोष सिद्ध हुए बिना दंडित करना न केवल अन्याय है, बल्कि यह भारत के लोकतांत्रिक और विधिक प्रणाली के मूल ढांचे पर भी आघात करता है। उन्होंने उदाहरण सहित यह भी बताया कि कैसे ग्रामीण इलाकों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां केवल ट्रक या वाहन के पास से शराब बरामद होने की आशंका मात्र पर बिना किसी परीक्षण या सुनवाई के वाहन जब्त कर लिए गए, और उनका वर्षों तक कोई निर्णय नहीं हुआ। इसके साथ ही धारा के अनुसार कलेक्टर को यह आजादी थी कि वह अपनी मर्जी से यह के कर सकते हैं कि उन्हें किसी मामले में वाहन को राजसात करना है और किस मामले में नहीं, जिससे ऐसे मामलों में भेदभाव भी लगातार सामने आ रहा था।

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संविधान के विरुद्ध है यह धारा- HC 

चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत, जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी, और जस्टिस विवेक जैन की फुल बेंच ने मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेष संवैधानिक परीक्षण के अंतर्गत धारा 47-A की वैधता पर विचार किया। पीठ ने यह स्वीकार किया कि यह धारा राज्य प्रशासन को अत्यधिक और अनुचित विवेकाधिकार प्रदान करती है, जिससे नागरिकों की संपत्ति और प्रतिष्ठा को अनावश्यक रूप से क्षति पहुंचती है। न्यायालय ने विशेष रूप से यह भी रेखांकित किया कि जब्त वाहन वर्षों तक पुलिस थानों या कार्यालय परिसरों में जंग खा रहे हैं, और उनके मालिक न्यायालयों की दहलीज पर भटकते रहते हैं  यह स्थिति एक “प्रक्रियात्मक अन्याय” का जीवंत उदाहरण है।

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असंवैधानिक घोषित हुई धारा 47-A

अदालत ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में कहा कि धारा 47-A संविधान की आत्मा के विपरीत है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में टिप्पणी की कि –
“जब तक कोई व्यक्ति दोष सिद्ध नहीं होता, तब तक उसे कानून के अनुसार निर्दोष माना जाना चाहिए। केवल आरोप के आधार पर उसे उसकी संपत्ति से वंचित करना न्याय का नहीं, बल्कि अन्याय का प्रतीक है।”
इसलिए अदालत ने यह निर्णय दिया कि मध्यप्रदेश आबकारी अधिनियम की धारा 47-A संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता), और 300-A (संपत्ति का अधिकार) का उल्लंघन करती है। परिणामस्वरूप, इस धारा को “शून्य और अप्रभावी” घोषित किया गया यानि यह अब यह धारा विधि के रूप में अस्तित्व में नहीं रहेगी।

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न्यायसंगत और पारदर्शी प्रक्रिया बनाए

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिया कि भविष्य में यदि जब्ती जैसी प्रक्रिया अपनाई जानी हो, तो उसके लिए ऐसी विधिक व्यवस्था बनाई जाए जिसमें नागरिकों को पर्याप्त सुनवाई का अवसर मिले। साथ ही, बिना न्यायालय की अनुमति के किसी भी प्रकार की संपत्ति जब्ती को “प्रशासनिक अनुचितता” माना जाएगा। यह निर्देश पुलिस और आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली में महत्वपूर्ण सुधार लाने की संभावना रखता है।

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हजारों मामलों पर पड़ेगा फैसले का असर

इस फैसले का प्रभाव केवल कुछ याचिकाकर्ताओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका प्रभाव राज्यभर में दर्ज हजारों ऐसे मामलों पर पड़ेगा, जिनमें वर्षों पूर्व वाहन या संपत्ति जब्त की गई थी, लेकिन अभी तक दोष सिद्धि नहीं हुई है। ऐसे कई मामले भी सामने आते थे जिसमें किराए का वाहन लेकर उनका दुरुपयोग अवैध परिवहन में किया जाता था। अब उन वाहन मालिकों को अपने वाहन की वापसी की मांग करने का कानूनी अधिकार मिलेगा। इस निर्णय से प्रभावित कई ऐसे परिवार हैं जिनका जीवन यापन पूरी तरह से उस वाहन पर निर्भर था, और उन्हें अब न्यायिक संरक्षण की उम्मीद मिली है।

मील का पत्थर साबित होगा आदेश

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का यह निर्णय सुनिश्चित करता है कि राज्य की शक्ति हमेशा नागरिकों के मौलिक अधिकारों के अधीन है और किसी भी प्रशासनिक निर्णय को संविधान के दायरे में रहकर ही लागू किया जा सकता है। यह फैसला न्याय की परिभाषा को केवल सजा देने तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे एक सुरक्षात्मक ढांचे के रूप में प्रस्तुत करता है, जो नागरिकों की गरिमा, स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा की रक्षा करता है।

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