उज्जैन में हुआ था भगवान शनि देव का जन्म, जानें जन्म की कथा और रहस्य

भगवान श्री शनि देव को हिन्दू धर्म में ग्रहों के राजा के रूप में पूजा जाता है। श्री स्कंद पुराण के पंचम अवंती खंड के “क्षातासंगममहात्म्यं” नामक 67 अध्याय के श्लोक क्रमांक 46 से 55 तक शनि देव के जन्म का प्रसंग दिया गया है। पंडित अतुल रामनारायण तिवारी के अनुसार श्री स्कन्द पुराण के अध्याय 67 के अनुसार श्री शनि देव की जन्म कथा इस प्रकार है। 

शनि देव का जन्म और उनका महत्व भारत के कई पौराणिक ग्रंथों में विस्तार से है। विशेष रूप से उज्जैन का त्रिवेणी संगम वह पवित्र स्थल है, जहां भगवान शनि देव का जन्म हुआ था। इस लेख में हम आपको शनि देव की जन्म कथा, उनके मंदिर और उनसे जुड़ी पौराणिक मान्यताओं के बारे में विस्तार से बता रहे हैं।

शनि देव का जन्मस्थान: उज्जैन त्रिवेणी संगम

श्री स्कंद पुराण के पंचम अवंती खंड के अनुसार, भगवान शनि देव का जन्म मध्यप्रदेश में उज्जैन के त्रिवेणी संगम पर स्थित श्री नवग्रह त्रिवेणी शनि मंदिर में हुआ था। त्रिवेणी संगम वह पवित्र जगह है जहां क्षाता, शिप्रा और अन्य नदियां मिलती हैं।

  • त्रिवेणी संगम (Triveni Sangam): उज्जैन में यह स्थान धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
  • नवग्रह त्रिवेणी शनि मंदिर: यह मंदिर नवग्रहों की पूजा का प्रमुख केंद्र है और शनि देव की प्राण प्रतिष्ठा यहां की गई है।

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सूर्य देव और संध्या देवी से उत्पन्न संतान

हिंदू धर्म के पुराणों में सूर्य देव और संध्या देवी की कथा अत्यंत महत्वपूर्ण और रोचक है। ये कथा न केवल सूर्य देव के जीवन की घटनाओं को उजागर करती है, बल्कि उनकी संतानों के जन्म और उनसे जुड़े रहस्यों को भी बताती है। आइए विस्तार से समझते हैं।

सूर्य देव और संध्या देवी का विवाह

सूर्य देव, जिन्हें हिंदू धर्म में दिन के देवता और प्रकाश का स्रोत माना जाता है, का विवाह हुआ था त्वष्टा विश्वकर्मा की पुत्री संध्या देवी से। संध्या देवी एक अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और देवता समान गुणों वाली देवी थीं। वे सूर्य देव की तेजस्विता सहन करने में सक्षम नहीं थीं, क्योंकि सूर्य देव का तेज इतना प्रबल था कि इसे सहना किसी भी जीव के लिए कठिन था।

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संध्या देवी का सूर्य के तेज को सहन न कर पाना

संध्या देवी को सूर्य देव का तेज इतना भारी और कठिन लगा कि वे उस तेज को सहन नहीं कर पाईं। उनके लिए सूर्य के तेज के कारण जीवन कठिन हो गया था। वे कई बार सूर्य देव के तेजस्विता को कम करने के उपाय सोचने लगीं। इस परिस्थिति में उन्होंने एक अनोखा निर्णय लिया।

संध्या देवी ने किया अपनी छाया का निर्माण

संध्या देवी ने अपनी ही एक प्रतिकृति बनाई, जिसे छाया कहा गया। छाया संध्या देवी की छाया या प्रतिबिंब थी, लेकिन उसकी अपनी चेतना और अस्तित्व था। संध्या देवी ने छाया को सूर्य देव की सेवा में भेज दिया और स्वयं अपने पिता के घर चली गईं।
छाया ने सूर्य देव की सेवा की और सूर्य देव के तेज का कुछ हिस्सा वह सहने लगी। संध्या देवी के पिता, विश्वकर्मा, इस परिस्थिति से असंतुष्ट थे क्योंकि संध्या अपने पति को छोड़ कर अपने पिता के घर आ गई थीं।

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विश्वकर्मा जी ने सूर्य देव का तेज किया कम 

सूर्यदेव आक्रोशित होकर संध्या के पिता के पास पहुंचे और उनसे संध्या के बारे में पूछा। ससुर विश्वकर्मा ने सूर्यदेव से कहा कि आपका तेज संध्या को तकलीफ दे रहा है, यदि वे कहें तो उनका  तेज थोड़ा कम कर सकते हैं, ताकि संध्या देवी इसे सह सकें।
विश्वकर्मा ने अपनी कला और ज्ञान से सूर्य देव के तेज को काटा, जिससे सूर्य का तेज कम हो गया। इस प्रक्रिया में उन्होंने सूर्य देव के तेज को कम करने के लिए सुदर्शन चक्र का उपयोग किया, जिसे उन्होंने एक काटने वाले यंत्र में तब्दील बदल दिया था।

सूर्य देव की तीन प्रमुख संतानें

संध्या देवी और सूर्य देव से तीन संतानों का जन्म हुआ इनमें-

  • वेवस्वत मनु : वेवस्वत मनु को मानवता का पहला मनु माना जाता है। उन्होंने मानवता के नियम और व्यवस्था की स्थापना की। वे धरती पर मानव जीवन के आधार और संरचना के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
  • यम देव : यम देव को मृत्यु के देवता और धर्म के संरक्षक के रूप में जाना जाता है। वे मृतकों के न्यायाधीश हैं और मृत्यु के बाद आत्मा के मार्गदर्शक भी।
  • यमुना देवी : यमुना देवी एक पवित्र नदी के रूप में पूजी जाती हैं। उनका जन्म संध्या देवी और सूर्य देव की संतान के रूप में हुआ और वे हिंदू धर्म में पवित्रता का प्रतीक हैं।

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सूर्य देव और छाया देवी से जन्मी संतानें

छाया देवी ने भी एक पुत्र और एक कन्या को जन्म दिया। इनमें-

  • पुत्र शनि देव (शनि ग्रह के देवता): शनि देव को सूर्य देव और छाया देवी का पुत्र माना जाता है। उनका जन्म उज्जैन के त्रिवेणी संगम में हुआ था, जहां वे नवग्रहों में विशेष स्थान रखते हैं।
  • कन्या तापी : छाया देवी ने तापी नामक एक पुत्री को भी जन्म दिया, जो  बाद में तपस्या करके नदी के रूप में प्रसिद्ध हुईं।

ऐसे हुआ देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों का जन्म 

संध्या देवी से जब सूर्य देव का तेज सहन नहीं हुआ तो वे अपने पिता के घर गई। यहां संध्या के पिता को उनका आना पसंद नहीं आया। इसके बाद संध्या देवी महाकाल वन में जाकर घोड़ी का रूप धारण कर तपस्या करने लगीं। वहां वे सूर्य देव के तेज से मुक्ति पाने की इच्छा लेकर तपस्या में लीन हो गईं।
सूर्य देव को ससुराल पहुंचने पर ससुर विश्वकर्मा जी से पता चला कि संध्या देवी तो महाकाल वन में तपस्या में लीन हैं। इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी को पुनः प्राप्त करने के लिए महाकाल वन की यात्रा की और पत्नी संध्या देवी को घोड़ी के रूप में पाया। तब सूर्य देव ने अपना रूप भी घोड़े का बना लिया। इस दौरान घोड़ी और सूर्य देव के बीच संबंध से अश्विनीकुमारों का जन्म हुआ, जो देवताओं के वैद्य माने जाते हैं।

नवग्रहों का महत्व और शनि देव का स्थान

नवग्रहों में शनि देव का विशेष स्थान है। नवग्रह मंदिर में श्री शनि देव के साथ श्री गणेश, बालाजी हनुमान और ढैय्या शनिदेव की पूजा होती है। नवग्रहों की पूजा से व्यक्ति को राज्य, धन, और समृद्धि मिलती है।

शनि देव की पूजा और शनि जयंती

  • शनि जयंती हर वर्ष 27 मई को मनाई जाती है। इस दिन उज्जैन के त्रिवेणी संगम पर विशेष पूजा-अर्चना होती है।
  • भक्तजन शनि देव का स्तवन करते हैं और ग्रह शांति के लिए प्रार्थना करते हैं।
  • शनि देव के नामों का जाप और पाठ करने से शनि ग्रह के प्रकोप से बचाव होता है।

शनि देव से जुड़े श्लोक

श्री स्कंद पुराण में दिए गए श्लोक के अनुसार शनि देव के नामों का पाठ करने से शनि दोष नहीं होता-

सौरिःशनैश्चरोमन्दः कृष्णोऽनन्तोऽन्तकोयमः।
पिङ्गश्छायासुतोबभ्रुः स्थावरः पिप्पलायनः ।
एतानि शनिनामानि प्रातःकाले पठेन्नरः।
तस्यशानैश्चरीपीडा नभवेत्तुकदाचन।”

: उज्जैन महाकाल | नवग्रह पूजा | क्षिप्रा नदी 

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