अब वेटरनरी डॉक्टर भी करेंगे 65 साल तक सेवा, हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

मध्यप्रदेशnee में जबलपुर हाईकोर्ट ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह पशु चिकित्सकों की रिटायरमेंट की उम्र को एलोपैथिक और आयुष डॉक्टरों के समान 65 वर्ष तक बढ़ाने के लिए आवश्यक प्रावधान बनाए। यह फैसला न केवल पशु चिकित्सकों के लिए राहत देने वाला है, बल्कि समानता और न्याय की मिसाल भी पेश करता है।

इस मामले में 2 अप्रैल 2025 को अंतिम सुनवाई हुई थी जिसके बाद चीफ जस्टिस ने इस मामले को हर्ड एंड रिजर्व में रखा था। आज 19 मई को इस मामले में आदेश जारी किया गया है।  इस मामले में अधिवक्ता सुयश मोहन गुरु और अधिवक्ता के सी गिडयाल ने पैरवी की है।

चीफ जस्टिस के हर्ड एंड रिजर्व के लगभग 7 से 8  बड़े मामले पेंडिंग है कल तक सभी आने की उम्मीद है, इसके अलावा जस्टिस संजीव सचदेवा के होमगार्ड मामले का भी ऑर्डर लगभग दो माह से पेंडिंग चल रहा है वह भी आने की उम्मीद है

वर्षों बाद अब जाकर मिला इंसाफ

राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2011 में एक संशोधन अधिनियम के माध्यम से एलोपैथिक और आयुष पद्धति के डॉक्टरों की सेवानिवृत्ति आयु 62 से बढ़ाकर 65 वर्ष कर दी गई थी। यह निर्णय सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में काम कर रहे डॉक्टरों के अनुभव और कुशलता को ध्यान में रखते हुए लिया गया था, जिससे चिकित्सा सेवाओं को मजबूती मिल सके। परंतु इसी दौरान राज्य सरकार के पशुपालन एवं डेयरी विभाग में कार्यरत पशु चिकित्सकों को इस लाभ से वंचित रखा गया। इससे वेटरनरी डॉक्टरों में निराशा और आक्रोश पनपने लगा, क्योंकि वे भी मेडिकल सेवा का ही हिस्सा हैं, लेकिन उनके साथ भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया गया।

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पशु चिकित्सकों ने पेश की संविधान की दलीलें

इस अन्याय के खिलाफ पशु चिकित्सकों के एक समूह, जिनमें डॉ. ओपी सिंह सहित कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे, ने वर्ष 2022 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। उन्होंने अपनी याचिका में स्पष्ट रूप से कहा कि सरकार द्वारा किया गया यह भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है। उनका तर्क था कि वे भी डॉक्टर हैं, सरकार की सेवा में हैं और जानवरों का इलाज करते हैं, तो उन्हें केवल इसलिए भिन्न मानना कि वे इंसानों का इलाज नहीं करते, यह पूरी तरह से अनुचित और गैरकानूनी है।

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एलोपैथिक, आयुष और पशु चिकित्सकों में कोई भेद नहीं होना चाहिए: HC 

19 मई 2025 को चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की खंडपीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए अपने फैसले में कहा कि पशु चिकित्सकों की सेवा का भी उतना ही महत्व है जितना एलोपैथिक और आयुष डॉक्टरों की सेवाओं का। उन्होंने कहा कि जब तीनों ही चिकित्सा सेवाएं सरकार के अधीन काम कर रही हैं, और जनता की भलाई के लिए समान रूप से योगदान दे रही हैं, तब केवल पदनाम या उपचार के विषय के आधार पर सेवानिवृत्ति की आयु में अंतर करना गैर-जरूरी और असंवैधानिक है।

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कोर्ट ने माना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन

कोर्ट ने निर्णय में स्पष्ट तौर पर कहा कि यह संशोधन, जिसमें केवल एलोपैथिक और आयुष डॉक्टरों की रिटायरमेंट आयु को 65 वर्ष किया गया, लेकिन पशु डॉक्टरों को इससे बाहर रखा गया, संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा कि समान पद और सेवा में कार्यरत व्यक्तियों के बीच भेदभाव करना भारत के संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है, और इस प्रकार का विभाजन केवल असमानता को बढ़ावा देता है।

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हाईकोर्ट ने सरकार को दिए सख्त निर्देश

कोर्ट ने न केवल भेदभावपूर्ण संशोधन को असंवैधानिक ठहराया, बल्कि राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिया कि वह जल्द से जल्द पशु चिकित्सकों की सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष निर्धारित करने के लिए आवश्यक नियम और प्रावधान बनाए। साथ ही कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि जब तक सरकार नए नियम नहीं बनाती, तब तक यह निर्णय प्रभावी रहेगा। यानी अब राज्य के सभी पशु चिकित्सक 65 साल की उम्र तक सेवा में बने रह सकेंगे।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्णय का लिया सहारा

इस मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक महत्वपूर्ण निर्णय का हवाला भी दिया। North Delhi Municipal Corporation बनाम राम नरेश शर्मा (2021) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि आयुष और एलोपैथिक डॉक्टरों की सेवानिवृत्ति आयु में अंतर करना, उपचार प्रणाली के आधार पर, असंवैधानिक और भेदभावपूर्ण है। उस फैसले के आधार पर आयुष डॉक्टरों को 65 वर्ष तक सेवा का अधिकार मिला था। हाईकोर्ट ने अब उसी सिद्धांत को पशु डॉक्टरों पर भी लागू किया।

इस फैसले से यह होंगे जमीनी बदलाव

इस फैसले के लागू होने से सरकार को पशुपालन विभाग में नई नियुक्तियों के लिए तत्कालिक दबाव नहीं रहेगा और अनुभवी डॉक्टरों का ज्ञान और सेवा अधिक वर्षों तक मिलती रहेगी। साथ ही पशु चिकित्सा सुविधाओं की गुणवत्ता और निरंतरता बनी रहेगी, विशेषकर ग्रामीण और दूरदराज़ के क्षेत्रों में जहां डॉक्टरों की पहले से ही भारी कमी है। इससे विभागीय कार्यक्षमता भी बढ़ेगी और पशुधन से जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन में स्थिरता आएगी।

पशु चिकित्सकों में खुशी की लहर 

हाईकोर्ट के इस निर्णय से राज्यभर के पशु चिकित्सकों में खुशी की लहर दौड़ गई है। द सूत्र ने जब कटनी के पशु चिकित्सा सौरभ पांडे से इस मामले में बात की तो उनका कहना है कि उनके साथियों के द्वारा लंबे समय से इस अन्याय के खिलाफ संघर्ष किया जा रहा है और आज उन्हें वह न्याय मिला है, जिसका वे वर्षों से इंतज़ार कर रहे थे। इस फैसले ने न केवल उन्हें उनका अधिकार लौटाया है, बल्कि उनके पेशे को भी सम्मान और मान्यता दी है। कई पशु चिकित्सकों ने इसे “वेटरनरी सेवा के स्वाभिमान की जीत” बताया है।

फैसला बना न्याय और समानता की मिसाल

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल पशु चिकित्सकों के हितों की रक्षा करता है, बल्कि सरकारी सेवाओं में समानता की भावना को भी मजबूती प्रदान करता है। यह निर्णय संविधान की मूल भावना को संरक्षित करता है और दिखाता है कि देश की न्यायपालिका हर वर्ग के व्यक्ति को समान अवसर दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है। यह उन सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए प्रेरणा है जो आज भी समान अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं।

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