HC अगर 3 महीने में फैसला नहीं सुनाए तो मामला पहुंचेगा चीफ जस्टिस के पास – सुप्रीम कोर्ट

देश दुनिया न्यूज: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक बेहद जरूरी आदेश पारित किया। कोर्ट ने कहा कि अगर हाईकोर्ट की किसी बेंच ने सुनवाई पूरी करने के बाद भी तीन महीने तक फैसला सुरक्षित रखा और फैसला नहीं सुनाया, तो यह स्थिति न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। ऐसी हालत में उस केस को सीधे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के सामने रखा जाना चाहिए।

अदालतों पर जनता का भरोसा बनाए रखना जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालतों पर जनता का भरोसा बनाए रखना जरूरी है। जब किसी केस का फैसला लंबे समय तक टलता रहता है तो प्रभावित पक्षों को यह लगता है कि उन्हें समय पर न्याय नहीं मिल रहा। यह भावना पूरे न्यायिक तंत्र की छवि को नुकसान पहुंचाती है। इसलिए जरूरी है कि फैसलों में समयसीमा तय हो और उसका पालन भी सख्ती से किया जाए।

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6 महीने को घटकर 3 महीने हुई डेडलाइन

इससे पहले साल 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने अनिल राय बनाम बिहार राज्य केस में कहा था कि अगर हाईकोर्ट छह महीने तक फैसला नहीं सुनाता है तो केस को हाईकोर्ट चीफ जस्टिस के पास भेजा जाना चाहिए। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को और कड़ा करते हुए समय सीमा को 6 महीने से घटाकर 3 महीने कर दिया है।

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Registrar General की होगी जिम्मेदारी

नए निर्देश में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के Registrar General की भूमिका को भी अहम बना दिया है। कोर्ट ने कहा कि अगर तीन महीने पूरे होने के बाद भी फैसला नहीं आया है, तो Registrar General की जिम्मेदारी होगी कि वह मामले को चीफ जस्टिस के सामने रखे। इस प्रक्रिया में लापरवाही नहीं बरती जा सकती।

अन्य बेंच को भेजा जा सकेगा मामला

अगर मामला Chief Justice तक पहुंचता है तो उन्हें यह अधिकार होगा कि वे उस केस को किसी अन्य बेंच के सामने सूचीबद्ध करें। इसका मतलब यह हुआ कि अब एक ही बेंच पर लंबे समय तक केस अटका नहीं रहेगा और फैसला जल्दी आने की संभावना बढ़ जाएगी।

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न्याय में देरी का होता है बुरा असर

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि न्याय में देरी से सिर्फ व्यक्ति ही नहीं, बल्कि समाज पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। कई बार फैसले आने में इतनी देर हो जाती है कि उसका असर ही खत्म हो जाता है। यही वजह है कि अदालत ने अब यह ठोस कदम उठाया है ताकि लोगों को जल्दी और समय पर राहत मिल सके।

न्यायपालिका की साख पर असर

अदालत ने चिंता जताई कि अगर समय पर फैसले नहीं दिए जाते तो इससे अदालत की credibility (विश्वसनीयता) पर असर पड़ता है। लोगों को लगने लगता है कि अदालतें सिर्फ तारीख़ पर तारीख़ देने वाली संस्था बन गई हैं। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि यह धारणा खत्म करनी होगी और फैसलों की गति बढ़ानी होगी।

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इस फैसले के बाद यह उम्मीद की जा रही है कि हाईकोर्ट के स्तर पर फैसले जल्दी सुनाए जाएंगे। इससे न केवल जनता को राहत मिलेगी बल्कि न्यायपालिका पर बढ़ते बोझ को भी कम करने में मदद मिलेगी। यह कदम न्याय प्रणाली को तेज, पारदर्शी और भरोसेमंद बनाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

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