डिप्टी सीएम राजेन्द्र शुक्ल ने शेयर किया ट्रेन ट्रायल का फेक वीडियो, हुए जमकर ट्रोल

मध्य प्रदेश के डिप्टी सीएम राजेन्द्र शुक्ला एक सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर विवादों में हैं। उन्होंने एक्स पर रीवा-सिंगरौली रेलमार्ग पर ट्रेन ट्रायल का वीडियो साझा किया। वीडियो में WDP-4D इंजन दौड़ता दिख रहा था। डिप्टी सीएम ने इसे विंध्य क्षेत्र के विकास की नई रफ्तार बताया।

नेटीजंस ने थोड़ी देर बाद ही खुलासा कर दिया कि यह वीडियो मध्य प्रदेश का नहीं, बल्कि कर्नाटक का है। वीडियो दो महीने पहले एक यूट्यूब चैनल पर पोस्ट किया गया था। ट्रोल होने के बाद डिप्टी सीएम ने वीडियो हटा लिया। यह मामला राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। यह सरकारी सूचना के सत्यापन को लेकर सवाल खड़ा कर रहा है।

डिप्टी सीएम सोशल मीडिया पर घिरे

एमपी के उप मुख्यमंत्री राजेन्द्र शुक्ला 8 जून को सुबह 11:36 बजे एक्स पर एक वीडियो पोस्ट करते हैं। वीडियो में एक हाई-स्पीड ट्रेन दौड़ती दिख रही थी। उन्होंने इसे रीवा-सिंगरौली रेलमार्ग पर WDP-4D इंजन के ट्रायल का सफल वीडियो बताया। डिप्टी सीएम ने इसे विंध्य क्षेत्र के विकास की दिशा में बड़ा कदम बताया। लेकिन जल्द ही इंटरनेट यूजर्स ने वीडियो की सच्चाई उजागर कर दी।

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वीडियो कर्नाटक का निकला

जिस वीडियो रीवा-सिंगरौली रेलमार्ग का बताया गया, वह कर्नाटक के गडग-वाडी सेक्शन का था। यह वीडियो यूट्यूब चैनल “The Railway Explorer” पर मार्च 2024 में “CRS Speed Trial + Dust Storm | Gadag-Wadi section | Kushtagi-Linganabandi CRS” नाम से पहले ही अपलोड किया गया था। इससे स्पष्ट हो गया कि डिप्टी सीएम द्वारा साझा किया गया वीडियो मध्य प्रदेश से संबंधित नहीं था।

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विकास का दावा या जल्दबाजी ?

डिप्टी सीएम का वीडियो पोस्ट करना राजनीतिक दृष्टिकोण से एक बड़ा संदेश देने की कोशिश थी। इसका उद्देश्य विंध्य क्षेत्र के रेलवे विकास कार्यों को हाईलाइट करना था। लेकिन गलत वीडियो के कारण उनकी मंशा पर सवाल उठे। यह घटना दिखाती है कि सोशल मीडिया पर तथ्यों के बिना पोस्ट करना राजनीतिक और प्रशासनिक छवि को नुकसान पहुंचा सकता है।

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ट्रोल होने के बाद वीडियो किया डिलीट

गलती उजागर होने के बाद डिप्टी सीएम ने वीडियो को एक्स से हटा लिया। हालांकि, अभी तक उनकी ओर से कोई आधिकारिक माफ़ी या स्पष्टीकरण नहीं आया है। सोशल मीडिया पर लोग उनसे पारदर्शिता और ज़िम्मेदारी की मांग कर रहे हैं। यह सवाल भी उठ रहा है कि एक वरिष्ठ पद पर बैठे व्यक्ति ने बिना पुष्टि के ऐसा पोस्ट क्यों किया।

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टेक्नोलॉजी और पब्लिक ट्रस्ट का मुद्दा

इस मामले ने सरकारी सोशल मीडिया अकाउंट्स की सत्यता और विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। डिजिटल युग में जहां लोग सरकारी पोस्ट्स पर सूचना के लिए निर्भर रहते हैं, ऐसी चूक से उनका भरोसा कमजोर हो सकता है। यह घटना ट्रांसपेरेंसी और डिजिटल एथिक्स की आवश्यकता को और स्पष्ट रूप से सामने लाती है।

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फेक वीडियो

 

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