‘गीता का कर्म दर्शन’: शिक्षा में नैतिकता का नया अध्याय “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”

सिटी बीट न्यूज नेटवर्क बरेली  ( रायसेन )

यह श्रीमद्भगवद्गीता का वह अमर संदेश है जिसे मध्य प्रदेश सरकार ने अब केवल धार्मिक उपदेश तक सीमित न रखते हुए, ‘जीवन प्रबंधन’ और ‘नैतिकता’ के आधार के रूप में शिक्षा प्रणाली में समाहित करने का साहसिक निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में लिया गया यह निर्णय, छात्रों में कर्तव्यनिष्ठा, तनाव प्रबंधन और निर्णय लेने के कौशल को विकसित करने की एक महत्वपूर्ण पहल है।

मध्य प्रदेश सरकार का यह कदम नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) को बढ़ावा देने की दिशा में है।

– उद्देश्य: गीता को ‘धार्मिक ग्रंथ’ के बजाय ‘व्यावहारिक दर्शन’ (Practical Philosophy) के पाठ के रूप में प्रस्तुत करना, जो छात्रों को संघर्ष क्षमता प्रदान करे।

* शिक्षा में समावेश:

स्कूली पाठ्यक्रम: गीता के सार और नैतिक मूल्यों को मुख्य पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना।

उच्च शिक्षा: कॉलेजों में इसे वैकल्पिक विषय (Elective) या क्रेडिट कोर्स के रूप में शामिल करना।

अन्य क्षेत्र: पुलिस ट्रेनिंग सेंटरों में भी गीता पाठ को अनिवार्य करना, जिसका स्पष्ट उद्देश्य आरक्षकों में मानसिक तनाव में कमी और कर्तव्यनिष्ठा में वृद्धि लाना है।

– कानूनी और दार्शनिक समर्थन:

सरकार का यह निर्णय संवैधानिक मर्यादाओं और वैश्विक अकादमिक मान्यता के अनुरूप है:

* धर्मनिरपेक्षता: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 28 सरकारी संस्थानों में धार्मिक शिक्षा पर रोक लगाता है। सरकार गीता को धार्मिक व्याख्या के बजाय ‘नैतिक/दार्शनिक साहित्य’ के रूप में प्रस्तुत कर इस सीमा का सम्मान कर रही है।

* सर्वोच्च न्यायालय का रुख: 2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने गीता को “जीवन का विज्ञान (Science of Life)” बताकर, इसके दार्शनिक मूल्य को मान्यता दी थी।

* वैश्विक स्वीकृति: हार्वर्ड, ऑक्सफोर्ड और स्टैनफोर्ड जैसे शीर्ष वैश्विक विश्वविद्यालय इसे पहले से ही एथिक्स और लीडरशिप के पाठ्यक्रमों में पढ़ाते हैं।

– समावेशी क्रियान्वयन की आवश्यकता:

मध्य प्रदेश सरकार का यह निर्णय देश के व्यापक शैक्षणिक पैटर्न का हिस्सा है, जहाँ गुजरात, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे अन्य राज्य भी गीता के सिद्धांतों को पाठ्यक्रम में शामिल कर रहे हैं।

यह पहल सांस्कृतिक जड़ों और नैतिकता को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। यदि गीता को धर्मनिरपेक्ष और दार्शनिक दृष्टिकोण से, बिना किसी कट्टर धार्मिक व्याख्या के, केवल एक नैतिक मूल्य शिक्षा के भाग के रूप में पढ़ाया जाता है, तो यह निश्चित रूप से छात्रों में आत्म-नियंत्रण और मानसिक दृढ़ता विकसित करेगा।

हालांकि, इसकी सफलता समावेशी कार्यान्वयन पर निर्भर करती है। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि यह नैतिक आधार बने, न कि वैचारिक बहस का केंद्र।

✍️ भूपेंद्र सिंह राजपूत

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